लंबे समय तक आपसी सहमति से बने संबंधों को प्रथम दृष्टया दुष्कर्म नहीं माना जा सकता, High Court

मध्य प्रदेश High Court की जबलपुर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण मामले में अग्रिम जमानत देते हुए कहा है कि यदि दो बालिग व्यक्तियों के बीच लंबे समय तक आपसी सहमति से संबंध रहे हों, तो बाद में लगाए गए दुष्कर्म के आरोपों का परीक्षण तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा। केवल आरोप लग जाने से प्रथम दृष्टया अपराध सिद्ध नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा की एकलपीठ ने सिंगरौली निवासी राकेश चर्माकर द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने आरोपी को 50 हजार रुपये के निजी मुचलके एवं समान राशि के एक जमानतदार पर सशर्त अग्रिम जमानत प्रदान कर दी।

क्या है मामला

पुलिस थाना वैढ़न, जिला सिंगरौली में दर्ज अपराध क्रमांक 580/2026 में महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने विवाह का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। इस प्रकरण में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 69 के तहत मामला दर्ज किया गया था। गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका प्रस्तुत की।

आरोपी पक्ष की दलील

आरोपी की ओर से अधिवक्ता विशाल विन्सेंट राजेंद्र डेनियल एवं अविनाश कुमार सोनी ने पक्ष रखते हुए बताया कि शिकायतकर्ता के पति का हृदयाघात से निधन हो चुका था। इसके बाद वर्ष 2020 से दोनों के बीच संपर्क और संबंध स्थापित हुए। दोनों पहले से एक-दूसरे को जानते थे तथा उनके विवाह की चर्चा भी कभी हुई थी, लेकिन बाद में दोनों की शादी अलग-अलग व्यक्तियों से हो गई।

बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता को शुरू से ही जानकारी थी कि आरोपी विवाहित है। ऐसे में विवाह का झूठा आश्वासन देकर संबंध बनाने का आरोप प्रथम दृष्टया स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह भी कहा गया कि आरोपी आर्थिक रूप से महिला की सहायता करता रहा, लेकिन बाद में विवाद उत्पन्न होने पर महिला ने नोटिस भेजकर उसे पत्नी की तरह रखने या दुष्कर्म के मामले का सामना करने की चेतावनी दी थी।

अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने एफआईआर और महिला द्वारा पूर्व में जारी नोटिस का अवलोकन करने के बाद पाया कि दोनों पक्ष बालिग हैं और लंबे समय तक संबंध में रहे हैं। अदालत ने यह भी माना कि उपलब्ध तथ्यों से शिकायतकर्ता प्रथम दृष्टया सहमति से संबंध में रही प्रतीत होती है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं कर रहा है, लेकिन उपलब्ध परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ दिया जाना उचित है।

कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण आदेश

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश उन मामलों में महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है, जहां लंबे समय तक आपसी सहमति से चले संबंधों के बाद दुष्कर्म के आरोप लगाए जाते हैं। हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह केवल अग्रिम जमानत के स्तर पर दिया गया आदेश है और मामले का अंतिम निर्णय ट्रायल के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।

इस मामले में हाईकोर्ट में आरोपी पक्ष की ओर से अधिवक्ता विशाल विन्सेंट राजेंद्र डेनियल एवं मोरवा निवासी अधिवक्ता अविनाश कुमार सोनी ने पैरवी की।

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