शुरुआत मुझे इश्क हो गया, कोई बैद-हकीम बुलाओ से की तो मैं दीवाना हो गया, आओ जी आओ जी, प्राण वारूं, बइयां वारू की प्रस्तुति के बाद ख्यात गीत- कौन है वो, कौन है वो, कहां से वो आया और क्या कभी अंबर से सूर्य बिछड़ता है, क्या कभी बिन बाती दीपक जलता है से गति पकड़ ली। इसके बाद तो उन्होंने अध्यात्म एवं लोक रंग में पगी सांगीतिक प्रस्तुतियों से दर्शकों को झुमाने का क्रम शुरू किया तो बीतते समय का दर्शकों को अहसास ही नहीं हुआ। सुर-संगीत से कभी राजस्थानी पंजाबी औरा रचा तो कभी अध्यात्म की भावभूमि पर खड़ा कर दिया। बीच-बीच में सिंगरौलीवासियों से खुद को जोड़ा तो सिंगरौली महोत्सव में पूर्व की अपनी प्रस्तुति की याद की।
कहा- इस बार वाराणसी से आते समय सड़कों की हालत अच्छी मिली, जिससे यात्रा आनंददायक रही। प्रस्तुति की कड़ी में उन्होंने जब डमरू के साथ बम-बम लहरी के गायन के साथ नृत्य करना शुरू किया तो पूरा स्टेडियम झूम उठा। दर्शकों के मोबाइल की टॉर्च जलवाकर उन्होंने हीरे मोती मैं न चाहूं की प्रस्तुति दी माहौल प्रीतमय बना दिया।
उन्होंने एक के बाद एक क्रम से रंग दीनी, तौबा तौबा तेरी सूरत, टूटा-टूटा एक परिंदा टूटा कि फिर उड़ न पाया की प्रस्तुति दी तो दुनिया उटपटांगा से प्रस्तुतियों को विराम देते हुए शानदार आयोजन के लिए कलेक्टर व एसपी को सराहा। सिंगरौली महोत्सव के दूसरे दिन रविवार को कवि सम्मेलन में कवियों की रचनाएं गुदगुदाएंगी।
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